गरीबो की आहे ये बच्चों की चीखे
रूलाये नहीं तो वो इंसान कैसा
रहे चुप हमेशा जो अन्याय पर भी
कहाँ वो हुकूमत ये भगवान कैसा
हमारे घरो का सिसकता हैं बचपन
सुनो हस्पतालों ये इंतजाम कैसा उगाकर खिलाये बनाकर खिलाये
निकाला हैं किसने ये फरमान कैसा
गिरा दो ये नफरत की दीवार जल्दी
थको ना रूको ना ये आराम कैसा
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मनीष श्रीवास्तव ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


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